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भाजपा सहयोगियों की बैसाखी छोड़ खुद खड़े होने की राह पर,मिशन भगवा पार्ट 2

दिल्ली जितेंद्र शर्मा 

भाजपा ने शिवसेना प्रकरण के बाद रणनीति बिल्कुल बदल ली है।उत्तर भारत मे भाजपा ने खुद को बढ़ाने के दूसरे चरण में काम शुरू कर दिया है। अब भाजपा प्रदेशो में सहयोगियों की बैसाखी को छोड़ खुद को मजबूत करेगी।यह भाजपा के बढ़ने का दूसरा पड़ाव माना जा रहा है।

महाराष्ट्र प्रकरण के बाद भाजपा के निर्णयों से लग रहा है कि उसने सहयोगियों के प्रति अपनी रणनीति बदल दी है।इसका सबसे बड़ा सबूत है कि भाजपा को झारखंड में पता था कि उसे गठबंधन तोड़ने पर नुकसान उठाना पड़ेगा पर उसने सहयोगियों की ब्लैकमेलिंग के सामने झुकने से इनकार कर दिया।दरसल इसकी शुरुआत भाजपा ने गत लोकसभा चुनाव में ही कर दी थी जिसमे उसने क्षेत्रीय दलों को किनारे कर उस जातियों के खुद के नेताओ को प्रमोट किया था।इसका भाजपा को कितना लाभ मिला यह तो कहना मुश्किल है मगर वे दल जरूर नीचे चले गये।सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी इसका सजीव उद्धाहरण है।वहीं रालोद को भी पार्टी ने साफ कर दिया था कि आप गठबंधन नही विलय कीजिये।यह प्रयोग भाजपा ने पांच वर्ष पूर्व हरियाणा में किया था जिसमे वो सफल रही थी। जो लोग भाजपा को नजदीक से जानते हैं उन्हें पता है भाजपा अपनी रणनीति आगामी बीस साल को लेकर बनाती है।उसी रणनीति तैयार की जाती हैं और चेहरे तैयार किये जाते हैं 

पार्टी की रणनीति साफ है कि अब खुद को सहयोगियों की बैसाखी से अलग कर अपने दम पर खड़ा करना होगा,क्योंकि पार्टी भी जानती है कि यही समय है जब मोदी शाह की जोड़ी का फायदा उठा कर खुद को मजबूत बनाया जा सकता है।वही पार्टी साऊथ में मजबूत सहयोगियों की तलाश में जुटी है उसका पुरा ध्यान दक्षिण को मजबूत करने में है।

जो लोग सोच रहे है कि भाजपा कुछ प्रदेशो में सरकार बनाने के मौके गंवा रही है तो ये बिल्कुल गलत है,क्योकि भाजपा महाराष्ट्र झारखंड में सहयोगियों की बात मानकर सरकार बना सकती थी लेकिन उसने दूसरा रास्ता तय किया,जिसका दुर्गामी उसे लाभ भी मिलेगा।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार है।

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